भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य और पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने नरेंद्र मोदी सरकार की शिक्षा नीति, बजट आवंटन और प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने शिक्षा के बजट में कटौती, सरकारी स्कूलों के बंद होने, बढ़ते निजीकरण, पेपर लीक और व्यवस्था में फैल रहे भ्रष्टाचार को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है।
डॉ. जोशी ने पेपर लीक की समस्या को केवल परीक्षा प्रणाली की तकनीकी खामी मानने से इंकार किया है। इसे समाज और शासन में बढ़ रहे भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि जब लोगों को हर तरफ पैसे और भ्रष्टाचार का बोलबाला दिखता है, तो वे भी गलत रास्ते अपनाने लगते हैं। इसके लिए उन्होंने मूल रूप से सरकार और व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया है।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि परीक्षाओं के आयोजन और उनकी सुरक्षा के लिए जिस तरह के इंतजाम किए जा रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि यह कोई परीक्षा नहीं बल्कि युद्ध चल रहा है।
शिक्षा को रोजगार से जोड़ते हुए पूर्व मंत्री ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य ‘अर्थकारी’ होना चाहिए। आज स्थिति यह है कि एमए और पीएचडी की डिग्री ले चुके युवा नगर निगम में चतुर्थ श्रेणी या सफाई कर्मचारी की नौकरी करने को मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि कॉलेज तो खोले जा रहे हैं लेकिन यह नहीं देखा जा रहा कि वहां से पढ़कर निकलने वाले युवाओं के लिए रोजगार कहां है। जब युवाओं को नौकरी नहीं मिलेगी, तो व्यवस्था में असंतोष और गलत रास्ते अपने आप पैदा होंगे।
शिक्षा बजट और सरकारी प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि प्राथमिक शिक्षा और चिकित्सा के लिए बजट लगातार घट रहा है, जबकि सड़कों के निर्माण पर खर्च तेजी से बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है, लेकिन यह किसकी कीमत पर हो रहा है, इस पर विचार होना चाहिए। बिना इंजीनियरों और तकनीकी संसाधनों के केवल सड़कें बना देने से देश का वास्तविक विकास संभव नहीं है।
नई शिक्षा नीति पर टिप्पणी करते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि केवल इसलिए पुरानी शिक्षा नीति को बदलना उचित नहीं था क्योंकि उसे राजीव गांधी के कार्यकाल में बनाया गया था। उन्होंने कहा कि शिक्षा नीति का उद्देश्य किसी एक व्यापारिक या औद्योगिक नीति से जुड़ा नहीं होना चाहिए, बल्कि यह समग्र रूप से मनुष्य के विकास पर केंद्रित होनी चाहिए। उन्होंने हर बच्चे के लिए मोहल्ले और गांव के सरकारी स्कूलों में एक समान और निःशुल्क माध्यमिक शिक्षा की व्यवस्था लागू करने की जोरदार वकालत की।
शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण और मंहगी होती उच्च शिक्षा पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि पढ़ाई का खर्च इतना बढ़ा दिया गया है कि वह आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि देश के बड़े और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में ही छात्रों द्वारा आत्महत्या के मामले क्यों सामने आ रहे हैं।
इसके अंत में उन्होंने सरकारी स्कूलों की बदतर हालत और शिक्षकों की भारी कमी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होने के कारणों की समीक्षा करने के बजाय सरकार को वहां की बुनियादी और शैक्षणिक व्यवस्था को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।
