प्रयागराज। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को एक बड़े प्रशासनिक फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने प्रदेश के उन पूर्व ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिनका कार्यकाल समाप्त हो चुका था। हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को प्रथम दृष्टया ‘असंवैधानिक’ करार दिया है। इस न्यायिक हस्तक्षेप के बाद अब प्रदेश की पंचायत व्यवस्था के संचालन को लेकर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं।
क्या है पूरा मामला?
ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद, पंचायत राज व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए राज्य सरकार ने पूर्व प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में कार्यभार सौंपने का निर्णय लिया था। सरकार का तर्क था कि पंचायत चुनाव संपन्न होने तक प्रशासनिक कार्य और सरकारी योजनाएं बाधित न हों, इसलिए यह अस्थायी व्यवस्था लागू की गई है। हालांकि, इस फैसले को अरविंद राठौर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिका में तर्क दिया गया कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद किसी को प्रशासक बनाना कानूनन सही नहीं है।
अदालत का रुख और प्रभाव
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता और संवैधानिक पहलुओं को गंभीरता से लेते हुए सरकार के उक्त आदेश पर रोक लगा दी। कोर्ट के इस निर्णय के बाद राज्य के प्रशासनिक गलियारों में हलचल मच गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पूर्व प्रधान प्रशासक नहीं रहेंगे, तो पंचायतों के दैनिक कामकाज और सरकारी धन का हस्तांतरण किस प्रक्रिया के तहत होगा?
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल यह मामला पूरी तरह न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। अगली सुनवाई 13 जुलाई को निर्धारित की गई है। सरकार को अब न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष और कानूनी तर्क मजबूती से रखने होंगे। राज्य सरकार इस आदेश के खिलाफ अपील करेगी या पंचायतों के संचालन के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था (जैसे सरकारी अधिकारियों को प्रशासक बनाना) लाएगी, यह आने वाले कुछ दिनों में स्पष्ट हो जाएगा।
हाईकोर्ट के इस आदेश ने प्रदेश में होने वाले आगामी पंचायत चुनावों की तैयारियों और स्थानीय राजनीति को भी प्रभावित किया है। विस्तृत आदेश और अगली सुनवाई के बाद ही यह स्थिति साफ हो पाएगी कि पंचायतों का भविष्य क्या होगा। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की नजरें अब 13 जुलाई की सुनवाई पर टिकी हैं।


