मथुरा: विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वाइल्डलाइफ एसओएस ने प्रकृति के संरक्षण और पारिस्थितिक पुनर्स्थापन (Ecological Restoration) का एक अद्भुत उदाहरण पेश किया। मथुरा स्थित हाथी संरक्षण एवं देखभाल केंद्र में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के तहत न केवल 2000 देशी फलदार वृक्ष रोपे गए, बल्कि युवाओं और स्कूली बच्चों को पर्यावरण संरक्षण का ‘सक्रिय रक्षक’ बनाने के लिए विशेष रचनात्मक कार्यक्रम भी चलाए गए।
2000 वृक्षों से बनेगा हरित गलियारा
इस वृक्षारोपण अभियान के तहत नीम, इमली, जामुन, अनार, अमरूद, शहतूत, अंजीर और कटहल जैसी देशी प्रजातियों के 2000 पौधे लगाए गए। संस्था के डायरेक्टर कंज़रवेशन प्रोजेक्ट्स, बैजूराज एम.वी. ने बताया कि इन वृक्षों का चयन विशेष रूप से किया गया है ताकि वन्यजीवों के लिए भोजन की उपलब्धता बढ़े, मिट्टी की सेहत सुधरे और स्थानीय सूक्ष्म जलवायु में सुधार हो सके। यह प्रयास भविष्य में एक सुदृढ़ ‘हरित गलियारा’ (Green Corridor) बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
युवाओं की रचनात्मक अभिव्यक्ति: ‘मूक प्राणियों की आवाज़’
हाथी संरक्षण केंद्र में आयोजित रचनात्मक कार्यक्रमों में कक्षा 6 से 12 तक के 20 विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
चित्रकला प्रतियोगिता: “विलुप्ति सदा के लिए है” विषय पर बच्चों ने प्रजातियों के नष्ट होने के भयावह परिणामों को रंगों के माध्यम से उकेरा।
नुक्कड़ नाटक: “मूक प्राणियों की आवाज़ बनें” के अंतर्गत छात्रों ने पशु क्रूरता, आवास विनाश और अवैध शिकार जैसी ज्वलंत चुनौतियों को मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
अतिथियों ने सराहा युवाओं का साहस
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बलदेव (मथुरा) के विधायक श्री पूरन प्रकाश, विधायक प्रतिनिधि श्री पंकज प्रकाश, मुख्य विकास अधिकारी डॉ. पूजा गुप्ता और प्रभागीय निदेशक (सामाजिक वानिकी) वेंकट श्रीकर पटेल उपस्थित रहे। अतिथियों ने स्वयं भी पौधारोपण किया और विद्यार्थियों की कलात्मक प्रतिभा एवं पर्यावरण के प्रति उनकी गंभीरता की सराहना की।
संरक्षण: एक सामूहिक जिम्मेदारी
इस अवसर पर वाइल्डलाइफ एसओएस के सीईओ कार्तिक सत्यनारायण ने कहा, “संरक्षण केवल संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। जब युवा कला और रंगमंच के माध्यम से पर्यावरण का पक्ष रखते हैं, तो वे भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक बेहतर दुनिया की नींव रखते हैं।”
वहीं, सह-संस्थापक और सचिव गीता सेशमणि ने इस बात पर जोर दिया कि संरक्षण का मूल मंत्र ‘सहअस्तित्व’ (Co-existence) है। आज लगाया गया हर एक पौधा उस पारिस्थितिक संतुलन को वापस लाने का प्रयास है, जिस पर हमारे वन्यजीव निर्भर हैं।


