भारत का सामाजिक ढांचा प्राचीन काल से ही विविधता से भरा रहा है, जिसमें विभिन्न समुदायों ने अपने-अपने तरीकों से योगदान दिया। इस संरचना में ब्राह्मणों की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है, क्योंकि वे समाज के बौद्धिक, आध्यात्मिक और नैतिक मार्गदर्शक के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं।
वेदों, उपनिषदों और स्मृतियों में ब्राह्मणों को ज्ञान और धर्म का संरक्षक बताया गया है, जिनका मुख्य कार्य समाज को नीति, शास्त्र और आध्यात्मिकता का मार्ग दिखाना था। इतिहास के विभिन्न कालखंडों में ब्राह्मणों ने राजाओं के सलाहकार के रूप में कार्य किया, शिक्षकों की भूमिका निभाई और धार्मिक अनुष्ठानों का नेतृत्व किया, किंतु उन्होंने स्वयं सत्ता पर अधिकार करने का प्रयास नहीं किया।
ब्राह्मणों की यह भूमिका भारतीय समाज की एक अनूठी विशेषता रही है। विश्व इतिहास में ज्ञान के संरक्षक आमतौर पर सत्ता में भी भागीदार रहे हैं, परंतु भारतीय परंपरा में ब्राह्मणों ने शासन के बजाय शिक्षा और नैतिकता के प्रचार को ही अपनी प्राथमिकता बनाए रखा। उन्होंने क्षत्रियों को राजसत्ता का दायित्व सौंपते हुए उनके लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई, जिससे समाज में एक संतुलन बना रहा। इस प्रकार, भारतीय समाज के प्रशासनिक और सांस्कृतिक स्वरूप में ब्राह्मणों ने एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, जो किसी भी अन्य सभ्यता में कम देखने को मिलती है।
भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था एक गतिशील सामाजिक ढांचा था, जिसमें जन्म के बजाय व्यक्ति के कर्म और गुणों के आधार पर उसका स्थान निर्धारित होता था। इस अवधारणा की पुष्टि ऋग्वेद के पुरुष सूक्त (ऋग्वेद 10.90) से होती है, जिसमें समाज को एक शरीर के रूप में चित्रित किया गया है। इसमें ब्राह्मणों को मुख, क्षत्रियों को भुजाएँ, वैश्यों को उदर और शूद्रों को चरण कहा गया है, जिसका प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि समाज के विभिन्न वर्गों का कार्य भिन्न-भिन्न होते हुए भी वे सभी परस्पर निर्भर और पूरक हैं। यह वर्गीकरण स्थिर नहीं था, बल्कि समाज में गतिशीलता की गुंजाइश थी।
श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से वर्ण व्यवस्था की आधारशिला को कर्म और गुणों पर स्थापित बताया है। गीता (अध्याय 4, श्लोक 13) में कहा गया है:
“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।”
अर्थात्, “यह चार वर्णों की व्यवस्था मैंने गुण (स्वभाव) और कर्म (कार्य) के अनुसार बनाई है।” यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि इस श्लोक में जन्म का कोई उल्लेख नहीं है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वर्ण व्यवस्था जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि व्यक्ति के कार्यों पर निर्भर थी।
इतिहास भी इस तथ्य की पुष्टि करता है कि प्राचीन काल में वर्णों में गतिशीलता थी। ऋषि वाल्मीकि, जिन्होंने रामायण की रचना की, के विषय में एक आम अवधारणा है कि वे निषाद जाति से थे। महर्षि वेदव्यास, जिन्होंने महाभारत की रचना की, एक मछुआरे की संतान थे। कई अन्य उदाहरण, जैसे विश्वामित्र, जो पहले क्षत्रिय थे और बाद में ब्रह्मऋषि बने, यह दर्शाते हैं कि व्यक्ति अपनी साधना और ज्ञान के आधार पर समाज में किसी भी भूमिका को अपना सकता था।
हालांकि, भारतीय समाज में केवल ब्राह्मणों का ही योगदान नहीं रहा, बल्कि कई अन्य समुदायों ने भी धार्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की। विशेष रूप से, समाज के वंचित वर्गों से आए संतों और विचारकों ने एक नया आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जिसने भारतीय भक्ति आंदोलन को एक नई दिशा दी। संत मतंग, जो शबरी के गुरु थे, ने अपने समय में समाज के पारंपरिक ढांचों को चुनौती दी और ज्ञान और भक्ति का प्रसार किया। अव्वैयार, जो चेरा राजवंश के अंतर्गत एक संत थीं, ने तमिल भक्ति साहित्य को समृद्ध किया और समाज में समानता और प्रेम का संदेश फैलाया। इसी तरह, नंदनार (जिन्हें नलै पोवार के नाम से भी जाना जाता है) ने भगवान शिव की भक्ति के माध्यम से सामाजिक बाधाओं को तोड़ने का प्रयास किया।
मध्यकालीन भारत में भक्ति आंदोलन के दौरान कई संतों ने जातिगत भेदभाव का विरोध किया और भक्ति को सामाजिक समानता का माध्यम बनाया। चोखामेला, जो मराठी संत परंपरा के एक प्रमुख कवि थे, ने अपनी रचनाओं में सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज उठाई और भक्ति को समानता की भावना से जोड़ा। इसी प्रकार, घासीदास ने सतनामी संप्रदाय की स्थापना की, जो समाज में भक्ति और आध्यात्मिक चेतना को एक नया आयाम देने का प्रयास था। वर्करी परंपरा के संत नामदेव और रैदासिया धर्म के संस्थापक रविदास ने भी अपने विचारों के माध्यम से जातिगत भेदभाव को चुनौती दी और धार्मिक समरसता का संदेश दिया।
इन संतों की शिक्षाओं ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय समाज में आध्यात्मिकता को किसी जाति-विशेष तक सीमित नहीं किया जा सकता। किंतु समय के साथ, कुछ पथभ्रष्ट ब्राह्मणों ने धर्मशास्त्रों की गलत व्याख्या की और सामाजिक असमानता को वैध ठहराने के लिए शास्त्रों को अपने स्वार्थ के अनुरूप मोड़ने लगे। विशेष रूप से मध्ययुगीन और औपनिवेशिक काल में, जब भारत में सामाजिक और राजनीतिक संरचनाएं तेजी से बदल रही थीं, कुछ ब्राह्मणों ने वर्ण व्यवस्था को एक कठोर जातिगत व्यवस्था में परिवर्तित करने में योगदान दिया।
ब्राह्मणों की इस पतनगाथा का प्रभाव यह हुआ कि दलित समाज में उनके प्रति रोष उत्पन्न हुआ, और उन्हें सामाजिक शोषण का प्रतीक माना जाने लगा। हालांकि, ऐतिहासिक रूप से अधिकांश उत्पीड़न के लिए वास्तविक रूप से शासक वर्ग, जमींदार और अन्य उच्च जातियों के अधिकारी अधिक जिम्मेदार थे, किंतु ब्राह्मणों द्वारा वेद की शिक्षाओं को गलत रूप से प्रस्तुत करने के कारण उनकी छवि धूमिल हो गई। इस आक्रोश का परिणाम यह हुआ कि आधुनिक काल में ब्राह्मण विरोध एक सामाजिक और राजनीतिक प्रवृत्ति के रूप में उभर आया, जिसमें ब्राह्मणों को समूचे जातिगत शोषण के लिए दोषी ठहराया जाने लगा।
इस समस्या का वास्तविक समाधान केवल जातिवादी सोच के अंत में निहित है। आधुनिक समाज को चाहिए कि वह जाति व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त कर, वेदों में वर्णित मूल ‘वर्ण’ व्यवस्था को पुनर्स्थापित करे, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति उसके कर्म और योग्यता के आधार पर निर्धारित हो, न कि उसके जन्म के आधार पर। यह केवल एक सैद्धांतिक सुझाव नहीं, बल्कि एक सामाजिक आवश्यकता है, क्योंकि जन्म-आधारित जातिगत संरचना भारतीय समाज की प्रगति में बाधा बन चुकी है।
समाज को जाति आधारित पहचान से ऊपर उठकर एक समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें हर व्यक्ति को उसकी प्रतिभा और योगदान के अनुसार सम्मान दिया जाए। ब्राह्मणों को भी अपने पारंपरिक दायित्वों को पुनः स्वीकार करना चाहिए और धर्म और शिक्षा के मार्गदर्शक की भूमिका में लौटना चाहिए, जिससे समाज में ज्ञान और नैतिकता का प्रसार हो सके। इसी प्रकार, दलित समाज को भी यह समझना आवश्यक है कि शोषण और सामाजिक अन्याय के खिलाफ संघर्ष ब्राह्मण विरोध का पर्याय नहीं हो सकता, बल्कि इसे व्यापक सामाजिक सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए।
भारतीय समाज का मूल स्वरूप एक बहुलतावादी और समावेशी संरचना पर आधारित रहा है, जिसे समय के साथ विकृत कर दिया गया। यदि समाज को पुनः एक न्यायपूर्ण और संतुलित दिशा में ले जाना है, तो इसके लिए जाति से ऊपर उठकर समाज को कर्म, ज्ञान और समानता की दृष्टि से देखना आवश्यक होगा। यही भारत के उज्ज्वल भविष्य का एकमात्र मार्ग है।
साभार सहित -विशाल शर्मा जी की फेसबुक वाल से

