ताज के साये में फल रहा इलाज का कारोबार, सेवा की जगह मुनाफे का मॉडल?

Cover Story
बृज खंडेलवाल

आगरा ताजमहल की खूबसूरती के साथ-साथ तेजी से फैलते निजी नर्सिंग होम और डायग्नोस्टिक नेटवर्क के लिए भी जाना जाने लगा है। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ते दबाव ने इलाज को सेवा से कारोबार की ओर मोड़ दिया है, जहां जांच, सर्जरी और बिल अक्सर ज़रूरत से ज़्यादा लगते हैं। अनियंत्रित निजी स्वास्थ्य सेवाएं, कमजोर निगरानी और मरीजों की अनभिज्ञता एक खतरनाक असंतुलन पैदा कर रही हैं। यह सिर्फ आगरा नहीं, पूरे भारत की सेहत व्यवस्था का आईना है।

आगरा दुनिया भर में ताज महल की बेमिसाल ख़ूबसूरती के लिए जाना जाता है। रोज़ हज़ारों सैलानी संगमरमर में तराशी मोहब्बत का दीदार करने आते हैं। लेकिन पर्यटकों की चहल-पहल से ज़रा हटकर, एक और कारोबार चुपचाप फल-फूल रहा है ; नर्सिंग होम, डायग्नोस्टिक लैब, निजी अस्पताल, दवा मार्केट नेटवर्क।

आगरा के कई मोहल्लों में नर्सिंग होम दीवार से दीवार सटे खड़े हैं। राम बाग से शाहदरा तक ट्रांस यमुना एरिया में, लाइन से स्वास्थ्य सेवाएं दे रही हैं डॉक्टरों के क्लीनिक और नर्सिंग होम्स। पैथोलॉजी लैब की नियॉन लाइटें टिमटिमाती हैं। अल्ट्रासाउंड सेंटर “कम्प्लीट पैकेज” का वादा करते हैं। इलाज अब सेवा कम, कारोबार ज़्यादा लगता है। और यह सिर्फ आगरा की कहानी नहीं है। यह समूचे भारत वर्ष की सेहत व्यवस्था के गहरे संकट का खौफनाक आईना है।

देश भर में सरकारी अस्पतालों पर बोझ बढ़ता जा रहा है। भीड़ बेहिसाब। स्टाफ कम। बजट सीमित। मरीज़ घंटों नहीं, कभी-कभी दिनों तक गलियारों में इंतज़ार करते हैं। ज़रूरी दवाइयाँ कम पड़ जाती हैं। डॉक्टरों पर काम का दबाव। नतीजा? मध्यम वर्ग निजी अस्पतालों की ओर रुख करता है। ग़रीब कर्ज़ लेते हैं। बीमारी एक आर्थिक जाल बन जाती है।

आगरा में स्वास्थ्य सेवा एक पूरा “इकोसिस्टम” बन चुकी है। एक छोटे नर्सिंग होम में दाखिल हों तो एक ही छत के नीचे परामर्श कक्ष, मेडिकल स्टोर, लैब, स्कैनिंग यूनिट, एम्बुलेंस ; सब मौजूद। देखने में सहूलियत। नाम “केयर”। पर अक्सर यह एक सघन रेफ़रल नेटवर्क की शक्ल ले लेता है। जांचें बढ़ती हैं। बिल बढ़ता है। शक़ भी।

सबसे चिंताजनक रुझान है सर्जरी, खासकर सीज़ेरियन डिलीवरी का बढ़ना। निजी अस्पतालों में सामान्य प्रसव कम होते जा रहे हैं। परिवारों को “कॉम्प्लिकेशन” का हवाला दिया जाता है। डर, तर्क से तेज़ काम करता है। ऑपरेशन महंगा है। आधुनिक लगता है। सुरक्षित भी प्रतीत होता है। मगर दुनिया भर के चिकित्सा विशेषज्ञ अनावश्यक सी-सेक्शन से सावधान रहने की सलाह देते हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर भी हालात अलग नहीं हैं। निजी अस्पतालों में सीज़ेरियन की दरें अनुशंसित सीमा से कहीं अधिक हैं। स्वास्थ्य सेवा धीरे-धीरे ख़िदमत से तिजारत की ओर खिसक रही है।

उधर आगरा के सरकारी संस्थान, खासकर सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पताल, भीड़ और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। आसपास के जिलों से मरीज आते हैं। बेड सीमित। डॉक्टर थके हुए। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञों की कमी है, जिससे ग्रामीणों को शहर के निजी क्लीनिकों की ओर जाना पड़ता है।

असंतुलन साफ़ है। शहरी भारत में डॉक्टर और बेड की उपलब्धता बेहतर। ग्रामीण भारत उम्मीद और रेफरल स्लिप पर निर्भर। कैंसर, डायबिटीज़, हृदय रोग जैसे गैर-संचारी रोग तेज़ी से बढ़ रहे हैं। इलाज महंगा। बीमा कवरेज असमान। जेब से खर्च (आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर) परिवारों को कर्ज़ में डुबो देता है।

अब आगरा की स्काईलाइन में होटलों जितने ही अस्पतालों के होर्डिंग दिखते हैं। “कैशलेस सुविधा।” “एडवांस्ड क्रिटिकल केयर।” “24 घंटे इमरजेंसी।” भाषा चमकदार। इंटीरियर वातानुकूलित। पर क्या मानक एक जैसे हैं? क्या ऑडिट सख्त हैं? क्या आपातकालीन तंत्र मज़बूत है?

कागज़ों पर नियम मौजूद हैं। क्लिनिकल एस्टेबिलिशमेंट एक्ट निजी स्वास्थ्य सेवाओं को मानकीकृत करने के लिए बना। उत्तर प्रदेश ने इसे अपनाया है। पर अमल ढीला दिखाई देता है। निरीक्षण अनियमित। पारदर्शिता सीमित। मरीज अपने अधिकारों से अक्सर अनजान।

एक खामोश गठजोड़ भी है। डायग्नोस्टिक रेफरल, दवा मार्जिन, कमीशन नेटवर्क। हर डॉक्टर इसमें शामिल नहीं। बहुत से ईमानदारी से सेवा देते हैं। मगर कुछ की गैर-एथिकल प्रैक्टिस पूरे सिस्टम की साख़ को नुक़सान पहुँचाती है। हर परिवार के मन में एक सवाल गूंजता है: इलाज ज़रूरी था, या मुनाफ़े का हिस्सा?

राष्ट्रीय तस्वीर भी सुकून नहीं देती। भारत अब भी अपने जीडीपी का सीमित हिस्सा सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करता है। डॉक्टर-रोगी अनुपात तना हुआ। शहरी-ग्रामीण खाई कायम। मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ सीमित। एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस बढ़ रही है। स्वास्थ्य क्षेत्र एक दोराहे पर खड़ा है।

क्या बदलना चाहिए?

पहलाः निजी नर्सिंग होम का सख्त और नियमित ऑडिट। कीमतों में पारदर्शिता। सर्जरी दरों का सार्वजनिक डैशबोर्ड।

दूसराः सरकारी अस्पतालों में वास्तविक निवेश। ढांचा, उपकरण, मानव संसाधन। स्वास्थ्यकर्मियों को इज़्ज़त और सुरक्षा।

तीसराः मरीज जागरूकता। सूचित सहमति (इनफॉर्म्ड कंसेंट) सिर्फ औपचारिकता नहीं, समझदारी का दस्तावेज़ बने।

चौथाः शिकायत निवारण तंत्र, जो तेज़ और निष्पक्ष हो।

स्वास्थ्य सेवा कोई लग्ज़री नहीं। कोई स्टेटस सिंबल नहीं। यह एक सामाजिक अनुबंध है। समाज और नागरिक के बीच भरोसे का रिश्ता।