आगरा। ताजनगरी के पर्यटन को केवल दीदार-ए-ताज तक सीमित न रखकर उसे एक गहरा सांस्कृतिक और शैक्षिक अनुभव बनाने की कवायद शुरू हो गई है। होटल डबल ट्री बाय हिल्टन में आयोजित ‘आगरा बियॉन्ड ताज’ सेमिनार में शहर के प्रबुद्ध वर्ग, पर्यटन विशेषज्ञों और उद्योगपतियों ने इस बात पर मंथन किया कि कैसे आगरा को ताजमहल के घेरे से बाहर निकालकर एक ‘होलिस्टिक’ (समग्र) टूरिज्म डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित किया जाए।
प्रमुख वक्ताओं के मुख्य विचार:
पर्यटन अब शिक्षा और अनुभव: डीईआई विश्वविद्यालय के वरिष्ठ निदेशक प्रो. प्रेम कुमार कालरा ने कहा कि आज का पर्यटक केवल फोटो खिंचवाने नहीं आता, वह इतिहास और सभ्यता को महसूस करना चाहता है। आगरा को अपनी दीर्घकालिक पर्यटन नीति में शिक्षा और सांस्कृतिक जुड़ाव को प्राथमिकता देनी होगी।
यमुना किनारे की अनदेखी विरासत: प्रो. रुपाली सत्संगी ने कछपुरा और यमुना किनारे स्थित मुगलकालीन अवशेषों के संरक्षण पर जोर दिया, जो आज भी उपेक्षित पड़े हैं।
नामों के पीछे का दिलचस्प इतिहास: पर्यटन विशेषज्ञ अरुण डंग ने हींग की मंडी, पीपल मंडी और नौलक्खा बाजार जैसे ऐतिहासिक स्थलों की रोचक कहानियाँ साझा कीं, जो पर्यटकों के लिए बड़े आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं।
पर्यावरण और उद्योग का संतुलन: उद्योगपति पूरन डावर ने चेतावनी दी कि बढ़ता AQI (वायु प्रदूषण) विरासत के लिए खतरा है। उन्होंने उद्योग और विरासत के बीच एक सतत संतुलन (Sustainability) बनाने की बात कही।
अध्यात्म की नई पहल: एक स्थान पर 12 ज्योतिर्लिंग
सेमिनार में एक बड़ा ऐलान डॉ. डी.वी. शर्मा की ओर से हुआ। उन्होंने अपनी 20 एकड़ भूमि में से 12 एकड़ पर ज्योतिर्लिंग निर्माण और शेष 8 एकड़ पर्यटन विभाग को दान करने का प्रस्ताव रखा, जिससे आगरा में आध्यात्मिक पर्यटन की एक नई धारा प्रवाहित हो सके।
ताजमहल ही नहीं, आगरा है ‘ग्लोबल हब’
टूरिज्म गिल्ड ऑफ आगरा के अध्यक्ष अमूल्य कक्कड़ ने स्पष्ट किया कि आगरा की औद्योगिक क्षमता और इसके ऐतिहासिक बाजार इसे दुनिया के किसी भी बड़े शहर के समकक्ष खड़ा करते हैं। बस जरूरत है इन सबको एक सूत्र में पिरोकर दुनिया के सामने पेश करने की।

