आगरा कोर्ट में कंगना रनौत का कबूलनामा: हां, मैंने दिए थे वो बयान, यह मेरी अभिव्यक्ति की आजादी

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आगरा। भाजपा सांसद और फिल्म अभिनेत्री “कंगना रनौत” के विवादित बयानों से जुड़े मामले में बुधवार को अदालत में अहम मोड़ आया। कंगना रनौत ने न्यायालय के समक्ष यह स्वीकार किया कि किसान आंदोलन और “भीख में मिली आज़ादी” से जुड़े बयान उन्हीं के थे। थाना न्यू आगरा पुलिस की जांच रिपोर्ट को कोर्ट ने रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले में अंतिम बहस के लिए 13 फरवरी 2026 की तारीख तय कर दी है।

आज थाना न्यू आगरा के प्रभारी निरीक्षक द्वारा तैयार पुलिस आख्या अदालत में दाखिल की गई, जिसे उप निरीक्षक के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। यह रिपोर्ट कोर्ट के निर्देश पर की गई जांच के आधार पर दाखिल हुई है। अदालत ने रिपोर्ट को पत्रावली में शामिल करते हुए दोनों पक्षों को विस्तृत बहस के लिए अगली तारीख दे दी।

किसान आंदोलन पर बयान स्वीकार

पुलिस जांच के दौरान कंगना रनौत ने माना कि 26 अगस्त 2024 को उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर किसान आंदोलन को लेकर टिप्पणी की थी। इसमें उन्होंने 2020-21 के आंदोलन के दौरान हिंसा, हत्या और बलात्कार जैसी घटनाओं का उल्लेख किया था और कहा था कि मजबूत नेतृत्व न होता तो देश में बांग्लादेश जैसे हालात बन सकते थे। अपने पक्ष में उन्होंने मीडिया रिपोर्टों का हवाला दिया, जिनमें आंदोलन की आड़ में कट्टरपंथी नेटवर्क की गतिविधियों का जिक्र था।

“भीख में मिली आज़ादी” वाले बयान पर सफाई

दूसरे विवादित बयान को लेकर कंगना ने स्वीकार किया कि 16 नवंबर 2021 को उन्होंने इंस्टाग्राम पर यह टिप्पणी की थी कि 1947 की आज़ादी “भीख में मिली आज़ादी” थी और उन्हें वास्तविक स्वतंत्रता का अनुभव 2014 के बाद हुआ।

कंगना का कहना है कि यह टिप्पणी उनकी वैचारिक सोच और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी वर्ग या समुदाय का अपमान करना नहीं था और उनके शब्दों को संदर्भ से हटाकर पेश किया गया।

अदालत में पक्षकारों की मौजूदगी

सुनवाई के दौरान कंगना की ओर से सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता सुधा प्रधान और स्थानीय अधिवक्ता विवेक शर्मा सहित कई वकील उपस्थित रहे। वादी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रमाशंकर शर्मा के नेतृत्व में अधिवक्ताओं की टीम मौजूद थी। हालांकि, अदालत ने आज किसी पक्ष की दलीलें नहीं सुनीं और सीधे तौर पर अंतिम बहस के लिए तारीख तय की।

आगे की राह

बयानों की स्वीकारोक्ति के बाद मामला और संवेदनशील हो गया है। एक ओर इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जा रहा है, तो दूसरी ओर सामाजिक और राष्ट्रीय भावनाओं के संदर्भ में इसकी कानूनी कसौटी पर जांच होनी है। अब 13 फरवरी को होने वाली बहस में यह स्पष्ट होगा कि ये बयान कानून के दायरे में कैसे परखे जाते हैं।