Agra News: गीता केवल ग्रंथ नहीं, समग्र विकास की मार्गदर्शिका…डीईआई के व्याख्यान में आधुनिक मनोविज्ञान और विज्ञान से जुड़ी कृष्ण की दृष्टि

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आगरा। श्रीमद्भगवद्गीता जयंती के पावन अवसर पर दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीईआई), आगरा तथा संस्कृत संस्कृति विकास संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में एक विशिष्ट ऑनलाइन/ऑफलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विषय “व्यक्तित्व के समग्र विकास में गीता का योगदान” रहा। आयोजन का उद्देश्य आधुनिक जीवन में गीता के दार्शनिक, नैतिक और व्यावहारिक महत्व को रेखांकित करना था। विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन-प्रबंधन और व्यक्तित्व निर्माण की सर्वकालिक मार्गदर्शिका है।

कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. पूजा द्वारा वैदिक मंगलाचरण से हुआ, जिससे वातावरण आध्यात्मिक और शांतिमय बन गया। इसके पश्चात डॉ. शोभा भारद्वाज ने स्वागत भाषण देते हुए अतिथियों का परिचय प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन भी डॉ. पूजा ने किया।

गीता नैतिकता, कर्तव्य और मानसिक संतुलन का विज्ञान

संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. अनीता ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि गीता जीवन-प्रबंधन, नैतिकता, मानसिक संतुलन और कर्तव्यनिष्ठा का समन्वित विज्ञान है। उन्होंने बताया कि निष्काम कर्म, स्थितप्रज्ञता और स्वधर्म जैसे सिद्धांत आज के तनावपूर्ण समय में व्यक्तित्व के बहुआयामी विकास के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।

ज्ञान-भक्ति-कर्म का संतुलन ही समग्र विकास की नींव

मुख्य अतिथि प्रो. रमण सोलंकी, अकादमिक निदेशक, महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ, उज्जैन ने गीता के शैक्षणिक और अनुसंधानपरक पक्षों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गीता में निहित ज्ञान, भक्ति और कर्म का त्रिविध मार्ग व्यक्ति को आंतरिक सामंजस्य की ओर ले जाता है, जो समग्र व्यक्तित्व विकास की आधारशिला है। उन्होंने उज्जैन को भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली बताते हुए ऐतिहासिक व पुरातात्विक संदर्भों का भी उल्लेख किया।

विज्ञान और मनोविज्ञान से जुड़ती है गीता की दृष्टि

विशिष्ट वक्ता डॉ. पवन उपाध्याय (जनरल मैनेजर, Lilac Insights Pvt. Ltd.), जो वैज्ञानिक एवं भक्ति योग के साधक हैं, ने आधुनिक पाश्चात्य जीवन-शैली की चुनौतियों के बीच गीता को समाधान के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने गीता के विज्ञान-सम्मत पक्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि मन की स्थिरता, इंद्रिय-निग्रह और ध्यान की विधियां आधुनिक मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस से सामंजस्य रखती हैं।

उन्होंने “योगः कर्मसु कौशलम्” सूत्र के माध्यम से कार्यक्षमता, रचनात्मकता और संतुलित व्यक्तित्व के विकास को स्पष्ट किया। भक्ति योग पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि आत्म-समर्पण और ईश्वर-प्रेम अहंकार से मुक्ति दिलाकर आंतरिक शांति प्रदान करता है।

संवाद परंपरा और बाल-वाणी ने किया भावविभोर

संस्कृत विभाग से डॉ. निशीथ गौड ने गीता में संवाद की परंपरा पर विचार रखे। वहीं द्वितीय कक्षा की बालिका अमोहा ने गीता के श्लोकों का अर्थ सहित सस्वर पाठ कर उपस्थितजनों को भावविभोर कर दिया।

150 प्रतिभागियों की सहभागिता, यूट्यूब पर हुआ लाइव प्रसारण

अंत में डॉ. रुबीना सक्सेना ने वक्ताओं, आयोजकों और ऑनलाइन श्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम का समापन शांति पाठ के साथ हुआ।

इस व्याख्यान में लगभग 150 प्रतिभागियों शिक्षक, शोधार्थी, छात्र एवं सामान्य जन ने ऑनलाइन सहभागिता की और प्रश्नोत्तर सत्र में सक्रिय भूमिका निभाई। कार्यक्रम का सीधा प्रसारण संस्कृत संस्कृति विकास संस्थान के यूट्यूब चैनल पर किया गया।

शिक्षाविदों की गरिमामयी उपस्थिति

कार्यक्रम में कला संकाय प्रभारी प्रो. संगीता सैनी, संगीत विभाग से प्रो. नीलू शर्मा, डॉ. नीतू गुप्ता, प्रो. रश्मि श्रीवास्तव, डॉ. अनीता, डॉ. निशीथ गौड, डॉ. इन्दु शर्मा सहित अनेक शिक्षाविद् उपस्थित रहे। आयोजन को डॉ. रुबीना सक्सेना, डॉ. पूजा और डॉ. शोभा भारद्वाज के समन्वय से सुव्यवस्थित एवं प्रभावी रूप मिला।

कार्यक्रम में यह संदेश स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया कि गीता का दर्शन बौद्धिक, भावनात्मक, नैतिक और आध्यात्मिक चारों आयामों में व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का अद्वितीय मार्गदर्शन देता है। वक्ताओं ने कहा कि सरल शब्दों में गीता एक ऐसा विश्वविद्यालय है, जिसमें जीवन की अनेक जटिल समस्याओं के समाधान निहित हैं।