मुंबई (अनिल बेदाग): हैदराबाद में शुरू हुआ इंटरनेशनल हेल्थ डायलॉग 2026 इस बार सिर्फ़ एक कॉन्फ्रेंस नहीं, बल्कि मरीज़ सुरक्षा पर वैश्विक सोच को नई दिशा देने वाला मंच बनकर उभरा। दुनिया के अलग-अलग देशों से आए हेल्थकेयर विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और एक्रेडिटेशन प्रोफेशनल्स के बीच भारत का अनुभव और पहल चर्चा के केंद्र में रहे।
‘ग्लोबल वॉइसेज़, वन विज़न’ थीम के साथ शुरू हुए इस सम्मेलन के पहले दिन की पूरी बहस मरीज़ सुरक्षा पर केंद्रित रही। वक्ताओं का मानना था कि बड़ी आबादी को स्वास्थ्य सेवाएं देने के भारतीय मॉडल से दुनिया बहुत कुछ सीख सकती है।
अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप की जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. संगीता रेड्डी ने कहा कि भारतीय अस्पतालों में लगातार नए प्रयोग और सुधार हो रहे हैं। उनका सवाल था कि जब इतना ज्ञान और अनुभव बन रहा है, तो उसे वैश्विक स्तर पर साझा क्यों न किया जाए।
अपोलो हॉस्पिटल्स एंटरप्राइज़ लिमिटेड के हॉस्पिटल्स डिवीजन के प्रेसिडेंट और सीईओ डॉ. मधु ससिधर ने साफ कहा कि मरीज़ सुरक्षा किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। उनके मुताबिक यह नेतृत्व का विषय है और पूरे संगठन की संस्कृति का हिस्सा बनना चाहिए।
इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर क्वालिटी इन हेल्थकेयर के सीईओ डॉ. कार्सटन इंगल ने याद दिलाया कि मरीज़ सुरक्षा लंबे समय से वैश्विक एजेंडा में है, लेकिन अभी बहुत काम बाकी है। उन्होंने लीडर्स से अपील की कि गलती पर सिर्फ़ दोषी ढूंढने के बजाय यह समझा जाए कि फैसले किन परिस्थितियों में लिए गए।
नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स के सीईओ डॉ. अतुल मोहन कोचर ने मरीज़ सुरक्षा को नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी बताया। उनका कहना था कि नीतियां बनाना आसान है, असली फर्क उनके सही क्रियान्वयन से आता है। उन्होंने ‘जीरो हार्म’ यानी शून्य नुकसान का लक्ष्य अपनाने पर जोर दिया।
पहले दिन की चर्चाओं का सार यही रहा कि मरीज़ सुरक्षा अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है। और इस मुद्दे पर भारत सिर्फ़ भागीदार नहीं, बल्कि दिशा दिखाने वाली भूमिका में उभर रहा है।

