देखि सुदामा की दीन दशा, करुणा करके करुणानिधि रोए… आगरा में भक्ति का ‘दिव्य लोक’: श्रीमद्भागवत कथा में ‘सुदामा चरित्र’ सुन छलक पड़े श्रद्धालुओं के आंसू, ड्रोन से हुई पुष्पवर्षा

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आगरा। ब्रज के आदि वन अग्रवन और यमुना नदी तट पर आयोजित श्री मनःकामेश्वर मंदिर मठ के श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ के सप्तम दिवस सुदामा चरित्र, व्यास पूजन और कथा विश्राम का ऐसा अलौकिक दृश्य देखने को मिला, जहां हजारों श्रद्धालु भक्ति और भाव में सराबोर दिखाई दिए। कथा मंडपम श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा और ड्रोन के माध्यम से हो रही पुष्पवर्षा ने पूरे वातावरण को मानो दिव्य लोक में परिवर्तित कर दिया। “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी…” के महामंत्र से यमुना तट देर रात तक गूंजता रहा।

सुदामा चरित्र सुन छलक पड़े श्रद्धालुओं के आंसू

कथा व्यास महंत योगेश पुरी ने सुदामा चरित्र का अत्यंत मार्मिक वर्णन करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण में कहीं भी “सुदामा” नाम का वर्णन नहीं है, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के उस मित्र का वर्णन है जिसने संदीपनि ऋषि के आश्रम में उनके साथ शिक्षा ग्रहण की।

उन्होंने कहा कि जिसका चित्त सुंदर हो, जिसका मन भगवान के नाम में रम गया हो, वही सच्चा सुदामा है। “अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो कि दर पे सुदामा गरीब आ गया है…” केवल कवि की कल्पना है, किंतु सुदामा की भक्ति और मित्रता सनातन संस्कृति की अमूल्य धरोहर है।

भगवान के नेत्रों से बही करुणा

महंत योगेश पुरी ने बताया कि जब चार मुट्ठी चावल लेकर सुदामा भगवान श्रीकृष्ण से मिलने पहुंचे, तब राजमहल की पंक्ति में खड़े अपने मित्र पर जैसे ही भगवान की दृष्टि पड़ी, उन्होंने तत्काल उन्हें पहचान लिया और दौड़कर गले लगा लिया।

उन्होंने कहा कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा के चरणों में लगे कांटे निकालने चाहे, तब वे कांटे साधारण नहीं थे, बल्कि वर्षों की तपस्या और कष्ट के प्रतीक थे। भगवान के नेत्र करुणा से सजल हो उठे। वह केवल आंसू नहीं थे, वह परम प्रेम और परमानंद की धारा थी।

जरासंध और शिशुपाल वध का सजीव चित्रण

कथा व्यास ने जरासंध और शिशुपाल वध प्रसंग का ऐसा सजीव वर्णन किया कि श्रद्धालु भावनाओं से भर उठे। उन्होंने कहा कि शिशुपाल ने भगवान श्रीकृष्ण को सौ से अधिक अपशब्द कहे, किंतु भगवान को क्रोध नहीं आया। परंतु जब पाप अपनी सीमा पार करता है, तब चक्रधारी का सुदर्शन अवश्य चलता है।

महाभारत की भ्रांतियों को किया दूर

महंत योगेश पुरी ने कहा कि महाभारत में कहीं भी यह वर्णन नहीं है कि द्रौपदी ने दुर्योधन का उपहास उड़ाया था। यह केवल कालांतर में फैलाई गई कल्पना है।

उन्होंने कहा कि ज्ञान का अभिमान भी फटे वस्त्र के समान है। जिसने धर्म, अर्थ और अपने जीवन का सब कुछ भगवान को समर्पित कर दिया, वही सच्चा सुदामा बन जाता है।

गोविंदम भज गोविंदम से गूंजा मंडपम

कथा के अंत में उन्होंने आदिगुरु आदि शंकराचार्य रचित “भज गोविंदम भज गोविंदम मूढ़मते…” का भावार्थ सुनाते हुए कहा कि अंततः सब कुछ ईश्वर को ही अर्पित करना है। इसके बाद “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी” महामंत्र का सामूहिक जाप हुआ, जिससे पूरा कथा मंडपम भक्तिरस में डूब गया।

ड्रोन से पुष्पवर्षा बना आकर्षण

कथा के दौरान ड्रोन के माध्यम से श्रद्धालुओं पर पुष्पवर्षा की गई। पुष्पवर्षा के बीच हजारों श्रद्धालु हाथ उठाकर भगवान श्रीकृष्ण के जयकारे लगाते रहे। यह दृश्य यमुना तट पर अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान कर रहा था। पुष्पवर्षा सेवा राजेश अमरनानी द्वारा कराई गई।

व्यास पूजन और आरती

दैनिक यजमान के रूप में राम बेटी गुप्ता, कमल गुप्ता, शशि गुप्ता, प्रियंका वर्मा, रवि वर्मा, अनिल खंडेलवाल एवं वीणा खंडेलवाल ने दैनिक पूजन किया।

वहीं एडवोकेट वसंत गुप्ता, अशोक जैन, उषा जैन ओसवाल कलाकृति परिवार द्वारा दिव्य आरती उतारी गई।

सोमवार को पूर्णाहुति और विशाल भंडारा

मठ प्रशासक हरिहर पुरी ने बताया कि सोमवार को हवन, पूर्णाहुति और विशाल भंडारे के साथ आयोजन का समापन होगा। भंडारा दोपहर 1 बजे से देर रात तक सभी श्रद्धालुओं के लिए खुला रहेगा।

उन्होंने बताया कि 31 मई को श्रवण गंगा सेवा समिति द्वारा श्रद्धालुओं के लिए निशुल्क गंगा स्नान बस यात्रा का आयोजन किया जाएगा, जिसमें कोई भी श्रद्धालु सहभागिता कर सकते हैं।