भगवान जगन्नाथ स्वामी की रथयात्रा का हुआ समापन

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पुरी। जगन्‍नाथ पुरी मंदिर की परंपरा के अनुसार आज बहुड़ा यात्रा न‍िकाली गई ज‍िसके अंतर्गत रूठी हुई मां लक्ष्‍मी को भवान जगन्‍नाथ ने मनाया और इसतरह 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव का समापन बाहुडा यात्रा से हुआ। 12 जुलाई से भगवान जगन्नाथ स्वामी की रथयात्रा का शुभारंभ हुआ था ज‍िसका आज समापन हुआ।

लक्ष्मी जी को मनाया जाता है

हेरा पंचमी की एक परंपरा में भगवान को ढूंढते हुए देवी लक्ष्मी गुंडिचा मंदिर जाती हैं, किसी बात से गुस्सा होकर भगवान के रथ का एक पहिया तोड़कर श्रीमंदिर चली आती हैं, द्वादशी के दिन श्रीमंदिर में लक्ष्मी जी के निर्देश से द्वैतापति दरवाजा बंद कर देते हैं। फिर भगवान जगन्नाथ लक्ष्मी जी को मनाकर मंदिर में प्रवेश करते हैं।

खोले जाते हैं मंदिर के द्वार

आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की दसवीं तिथि को सभी रथ पुन: मंदिर की ओर लौटते हैं। इस रस्म को बाहुडा कहते हैं। श्रीमंदिर लौटने पर द्वादशी के दिन मंदिर के द्वार खोलकर प्रतिमाओं को पुन: विराजमान किया जाता है। इस दौरान देवी-देवताओं को स्नान करवाकर मंत्र उच्चारण द्वारा विग्रहों को पुन: प्रतिष्ठित किया जाता है।

मौसी के घर भी ठहरते हैं

जगन्नाथ मंदिर से शुरू हुई यात्रा गुंडिचा मंदिर पहुंचती है। गुंडिचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा सात दिनों तक विश्राम करते हैं। इस मंदिर में भगवान के दर्शन आड़प दर्शन कहलाते हैं। माना जाता है कि लौटते वक्त भगवान की मौसी का घर पड़ता है, जहां रुककर वे पोर पिठा खाते हैं फिर आगे बढ़ते हैं।

– एजेंसी

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