”ॐ जय शिव ओंकारा” में है त्रिदेव की स्तुति और त्र‍िदेव हैं साक्षात् गुरू दत्तात्रेय

धर्म/ आध्‍यात्‍म/ संस्‍कृति

आमजन में प्रचल‍ित श‍िव आरती ”ॐ जय शिव ओंकारा” में त्रिदेव की स्तुति की गई है ज‍िसमें ॐ के नाद है त्रिदेव और त्र‍िदेव का साक्षात प्राकट्य है भगवान दत्तात्रेय का स्वरूप।

प्रायः शिव आराधना और पूजन के उपरांत इस आरती का गायन शिव भक्त बहुत ही भाव से करते हैं, मान्यता भी है यह दिव्य आरती भगवान शिव को अत्यंत प्रिय भी है। यदि इस दिव्य आरती के भाव को समझने का प्रयास करें तो स्पष्ट हो जाता है कि इस आरती के पदों में भगवान ब्रह्मा- विष्णु- महेश अर्थात् त्रिदेव का स्तुति गायन निहित है।

जैसे क‍ि –
एकानन (एकमुखी, विष्णु), चतुरानन (चतुर्मुखी, ब्रम्हा) और पंचानन (पंचमुखी, शिव) राजे..

हंसासन(ब्रम्हा) गरुड़ासन(विष्णु ) वृषवाहन (शिव) साजे..

दो भुज (विष्णु), चार चतुर्भुज (ब्रम्हा), दसभुज (शिव) अति सोहे..

अक्षमाला (रुद्राक्ष माला, ब्रम्हाजी ), वनमाला (विष्णु ) मुण्डमाला (शिव) धारी..

चंदन (ब्रम्हा ), मृगमद (कस्तूरी विष्णु ), चंदा (शिव) भाले शुभकारी (मस्तक पर शोभा पाते हैं)..

श्वेताम्बर (सफेदवस्त्र, ब्रम्हा) पीताम्बर (पीले वस्त्र, विष्णु) बाघाम्बर (बाघ चर्म ,शिव) अंगे..

ब्रम्हादिक (ब्राह्मण, ब्रह्मा) सनकादिक (सनक आदि, विष्णु ) प्रेतादिक (शिव ) संगे (साथ रहते हैं)..

कर के मध्य कमंडल (ब्रम्हा), चक्र (विष्णु), त्रिशूल (शिव) धर्ता..

जगकर्ता (ब्रम्हा) जगहर्ता (शिव ) जग पालनकर्ता (विष्णु)..

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका (अविवेकी लोग इन तीनो को अलग अलग समझते अथवा मानते हैं)

प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका अर्थात् किसी भी देव का ध्यान करें , प्रसन्नता और प्रतिष्ठा तीनों पर:ब्रह्म की निहित है।

त्रि-देव रुप के लिए वेदों में ओंकार नाद को ॐ के रुप में प्रकट किया गया

संत मत से ,सृष्टि के निर्माण के मूल ऊँकार नाद में ये तीनो एक रूप रहते हैंं… आगे सृष्टि-निर्माण, सृष्टि-पालन और संहार हेतु त्रिदेव का रूप धारण करते हैं। संभवतः इसी त्रि-देव रुप के लिए वेदों में ओंकार नाद को ॐ के रुप में प्रकट किया गया है ।ॐ का नाद स्वयं भगवान दत्तात्रेय जी महाराज के समर्थ श्री चरणों को प्राप्त करता है।

आदौ ब्रह्मा मध्य विष्णुरंते देव: सदाशिव:।
मूर्तित्रयस्वरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते।।

त्रिदेव का साक्षात प्राकट्य भगवान दत्तात्रेय के स्वरूप में , भगवती सती अनसुया और अत्रि ऋषि के पुत्र रूप में हुआ है।

दत्तात्रेयो हरि: साक्षाद्भुक्तिमुक्तिप्रदायक: ।।

भगवान दत्तात्रेय साक्षात भुक्ति और मुक्ति प्रदायक हैं।

दिगम्बरं भस्मसुगन्धलेपनं चक्रं त्रिशूलं डमरुं गदायुधम् ।
पद्मासनं योगिमुनीन्द्रवन्दितं दत्तेति नामस्मरणेन नित्यम्॥

अत: भगवान दत्तात्रेय जी महाराज त्रिदेव के समस्त अलंकार , आभूषण और गुणों को धारण करते हुए भक्तों पर सहज कृपा करने वाले हैं।

– कप‍िल शर्मा,
सच‍िव , श्रीकृष्ण जन्मस्थान,
मथुरा

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