गीता प्रेस गोरखपुर का ‘स्वर्णिम काल’ लौटा, अक्टूबर में हुई 6 करोड़ 80 लाख रुपये की बिक्री

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गोरखपुर। घर-घर में श्रीमद्भगवतगीता और रामचरितमानस पहुंचाकर गोरखपुर की पहचान बनी गीताप्रेस का ‘स्वर्णिम काल’ लौट आया है। लॉकडाउन का समय गुजरते-गुजरते यहां छपने वाली धार्मिक पु्स्तकों की मांग भी तेजी से बढ़ गई है। इस साल हर गुजरते महीने के साथ ही गीताप्रेस में छपने वाली पुस्तकों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। अकेले अक्टूबर में ही 6 करोड़ 80 लाख रुपये की किताबों की बिक्री हुई है।

गीताप्रेस से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक इस साल 22 करोड़ से अधिक कीमत की पुस्तकों की बिक्री हो चुकी है। कोरोना संक्रमण की वजह से लगे लॉकडाउन की वजह से पुस्तकों की छपाई बंद हो गई थी लेकिन डर और निराशा के माहौल के बीच यहां के पुस्तकों की मांग में तेजी आई है।

आंकड़े के मुताबिक इस साल अप्रैल में 39 लाख, मई में 57.75 लाख, जून में 2.62 करोड़, जुलाई में 3.35 करोड़, अगस्त में 3.68 करोड़, सितंबर 5.64 करोड़, अक्टूबर में 6.80 करोड़ रुपये की पुस्तकों की बिक्री हुई। जून से लेकर अक्टूबर तक 22 करोड़ रुपये कीमत की पुस्तकें बेची जा चुकी हैं। हर साल की तुलना में यह आंकड़े अधिक हैं।

इतनी संख्या में छपाई के बावजूद ग्राहकों की डिमांड के मुताबिक सप्लाई पूरी नहीं हो पा रही है। 400 से अधिक पुस्तकों का स्टॉक खत्म हो गया है, जिसमें नारद पुराण, सचित्र हनुमान चालीसा, मत्स्य पुराण, वाल्मीकि रामायण (तमिल) गर्ग संहिता आदि शामिल हैं। पाठकों की मांग पूरी करने के लिए यहां ओवरटाइम काम हो रहा है। मशीनें 4 घंटे अधिक चल रही हैं।

धार्मिक पुस्तकों की छपाई के लिए मशहूर गीताप्रेस से गीता, रामायण, रामचरितमानस, पुराण, उपनिषद सहित अन्य कई किताबें प्रकाशित होती हैं। सरकार, किसी व्यक्ति, संस्था से गीताप्रेस किसी तरह का अनुदान नहीं लेता है। यहां से हिंदी, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, कन्नड़, बंगाली, मराठी, तमिल सहित 15 से भी अधिक भाषाओं में किताबें छपती हैं।

-एजेंसियां

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