वीर राजपूत राजा महाराणा प्रताप की आज है 479वीं जयंती

Updated 06 Jun 2019

भारत के गौरवशाली और वीरता से भरे इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करवाने वाले वीर राजपूत राजा महाराणा प्रताप की आज 479वीं जयंती है। वह मेवाड़ में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। प्रताप की जयंती के मौके पर देशभर में विभिन्न तरह के आयोजन किए जा रहे हैं और उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी है। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “देश के महान सपूत और वीर योद्धा महाराणा प्रताप को उनकी जयंती पर शत-शत नमन। उनकी जीवन-गाथा साहस, शौर्य, स्वाभिमान और पराक्रम का प्रतीक है, जिससे देशवासियों को सदा राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा मिलती रहेगी।”
 
मुगलों को कई बार युद्ध में हराया
राजस्थान के कुंभलगढ़ में महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जयवंत कंवरी के घर जन्मे महाराणा ने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। उन्होंने मुगलों को कई बार युद्ध में हराया भी।
अकबर की दोस्ती के खिलाफ रहे
महाराणा प्रताप और अकबर दोनों ही तलवारें टकराने से पहले सुलह करना चाहते थे। इसके लिए हमेशा अकबर की ओर से पहल की गई, जबकि महाराणा प्रताप हमेशा ऐसी दोस्ती के खिलाफ रहे।
दो लाख सैनिकों का 22 हजार ने किया मुकाबला
इतिहास के अनुसार अकबर ने साल 1576 में महाराणा प्रताप से लड़ाई करने का फैसला लिया था लेकिन ये लड़ाई उतनी भी आसान नहीं थी क्योंकि मुगल शासक के पास दो लाख सैनिक थे जबकि राजपूत सेना में महज 22 हजार सैनिक थे।
 
हथियारों से खेलने का शौक
महाराणा को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था। वह अपने माता-पिता की पहली संतान थे। राजमहल में पले-बढ़े महाराणा बचपन से ही बहादुर और अपने लक्ष्यों को पाने का हौसला रखते थे। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, उस उम्र में वह हथियारों से खेलते थे।
मान-सम्मान सबसे ऊपर
इतिहास कहता है कि महाराणा प्रताप को सबसे अधिक फिक्र मान-सम्मान की थी। उन्हें धन-दौलत और गहनों की कोई परवाह नहीं थी। वह कभी धन-दौलत गंवाने में पीछे नहीं रहे। लेकिन अपने मान-सम्मान को उन्होंने कभी झुकने नहीं दिया।
पूरे मेवाड़ पर किया राज
महाराणा प्रताप ने 1582 में दिवेर में एक भयानक युद्ध में भाग लिया। इस युद्ध में उन्होंने मुगलों को धूल चटाई थी। महाराणा ने चावंड को 1585 में अपनी राजधानी घोषित कर दिया। उन्होंने चित्तौड़गढ़, मांडलपुर को छोड़कर पूरे मेवाड़ पर राज किया था।



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