देश-दुनिया में विख्यात कुल्लू दशहरा महोत्सव: सैकड़ों देवी-देवताओं ने डेरा जमाया

Updated 07 Oct 2019

देश-दुनिया में विख्यात अंतर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरा महोत्सव मंगलवार को भगवान रघुनाथ की भव्य रथ यात्रा के साथ शुरू हो जाएगा। इस धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव के लिए कुल्लू घाटी के सैकड़ों देवी-देवताओं ने अठारह करड़ू की सौह ढालपुर मैदान में डेरा जमा लिया है। सोमवार शाम तक 200 के करीब देवता शहर में पहुंच चुके हैं। सात दिवसीय उत्सव में लाखों लोग देव-मानस मिलन का अद्भुत नजारा देखेंगे।
मंगलवार दोपहर 3.00 बजे के बाद राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय इस महोत्सव का विधिवत शुभारंभ करेंगे। 14 अक्तूबर तक चलने वाले कुल्लू दशहरा में देशी-विदेशी सांस्कृतिक दल शानदार प्रस्तुतियां देंगे। कुल्लू दशहरा के लिए पहली बार रिकॉर्ड 331 देवी-देवताओं को न्योता दिया गया है। देवी-देवताओं के आगमन से भगवान रघुनाथ की नगरी तपोवन में तबदील हो गई।
देवालय से निकलकर सैकड़ों देवी-देवता सात दिनों तक अस्थाई शिविरों में विराजमान रहेंगे और हजारों कारकून, हारियान और देवलू तपस्वियों की तरह रहेंगे। मंगलवार सुबह सभी देवी-देवता देव परंपरा का निर्वहन करते हुए रथयात्रा से पूर्व भगवान रघुनाथ के दरबार में शीश नवाएंगे। इसके बाद छड़ीबरदार महेश्वर सिंह ढोल-नगाड़ों की थाप पर भगवान रघुनाथ को मंदिर से कड़ी सुरक्षा के बीच रथ मैदान तक लाएंगे और जहां भव्य एवं अद्भुत समागम शुरू होगा।
माता भुवनेश्वरी भेखली और माता जगन्नाथी भुवनेश्वरी का इशारा मिलते ही रथयात्रा शुरू होगी। हजारों लोग, देशी-विदेशी सैलानी और शोधार्थी इसके साक्षी बनेंगे। रथयात्रा में शिरकत करने के बाद शाम को राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय लालचंद प्रार्थी कला केंद्र में उत्सव का शुभारंभ करेंगे। दशहरा उत्सव में शरीक होने से जिला कुल्लू के खराहल, मनाली, सैंज, आनी, निरमंड, बंजार के देवी-देवता कुल्लू पहुंच चुके हैं।
ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्त होने के लिए वर्ष 1650 में अयोध्या से लाई गई भगवान रघुनाथ की मूर्ति की पूजा के साथ कुल्लू दशहरा उत्सव शुरू हुआ था। तत्कालीन राजा जगत सिंह ने अपना राजपाठ भगवान रघुनाथ को सौंपकर छड़ीबरदार बनकर उनकी सेवा का संकल्प लिया था। तभी से यह आयोजन होता आ रहा है। अब इस परंपरा को राजपरिवार के सदस्य महेश्वर सिंह निभाते आ रहे हैं।
नजरबंद रहेंगे शृंगा ऋषि और बालू नाग
दशहरा उत्सव में रघुनाथ की मुख्य रथयात्रा के दौरान उनके दायीं ओर चलने को लेकर बरसों से शृंगा ऋषि और बालू नाग देवता में धुर विवाद चला आ रहा है। दोनों देवता दायीं ओर चलना चाहते हैं। इसे लेकर देवलुओं में टकराव हो जाता है। प्रशासन न्योता भी नहीं देता लेकिन हर बार दोनों देवता बिन बुलाए आते हैं। इस बार भी दोनों देवता नजरबंद रहेंगे। इनका विवाद आज तक सुलझ नहीं पाया।
कुल्लू दशहरा में शुरू से ही अष्टांग बलि की प्रथा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद इसे बंद कर दिया गया। अब देव समाज का दावा है कि कोर्ट ने फिर से उन्हें पर्दे में बलि की इजाजत दे दी है।
-एजेंसियां



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